आजकल नशे में हूँ पर... सम्हलना आदत है मेरी |
हर शाम को मिलता है किसी का दीदार वहाँ, पर...वहाँ से लौट आना आदत है मेरी ||
सोचा एक दिन, अब न जाऊँगा उन्हें देखने,
वहाँ जाकर उनसे अपने ही अंदाज में बातें करने,
पर गबराया बहुत...वहाँ ना जाकर,
कि...बार-बार वहाँ जाना आदत है मेरी |
.....आजकल नशे में हूँ पर...सम्हलना आदत है मेरी ||
कहते हैं हर काम को अंजाम दे सकते हैं आप,
ठान लो ग़र तो सब कुछ पा सकते हैं आप |
देखा मैंने भी मनाकर अपने दिल को बहुत...उन्हें भूल जाऊँ,
पर भूले से भी उन्हें ना भूल पाना...आदत है मेरी |
.....आजकल नशे में हूँ पर...सम्हलना आदत है मेरी ||
आखों से आजकल नज़र कुछ भी आता नहीं,
आजकल दिल से भी उनका अक्श जाता नहीं,
चलते हुए ...रास्ते पर लड़खड़ाते हैं पैर मेरे 'राम'
पर...सम्हलना आदत है मेरी |
.....आजकल नशे में हूँ पर...सम्हलना आदत है मेरी ||
आजकल नशे में हूँ पर... सम्हलना आदत है मेरी |
हर शाम को मिलता है किसी का दीदार वहाँ,
पर...वहाँ से लौट आना आदत है मेरी ||
हर शाम को मिलता है किसी का दीदार वहाँ,
पर...वहाँ से लौट आना आदत है मेरी ||
1 टिप्पणी:
HII RAM , JAYATI HERE..THOUGH I CAN"T UNDERSTAND ALL THE WORDS...BT TRULLY SPEAKING, THIS POEM IS SIMPLY AWESOME..IT TOUCHES MY SOUL WHEN I READ IT..KEEP IT UP BUDDY..GREAT JOB..
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