फिरता तो पहले भी था पर अब सम्हल गया हूँ मैं ||
चलते हुए लम्हों की बिसात में, आज खिलाडी बन गया हूँ मैं |
खेलता हूँ मैं भी अब इस खेल को, कुछ इक चाल भी चलता हूँ मैं ||
दीदार-ए-करम करते करते, राह पर चलता हूँ मैं...
वक़्त को लिए हाथ मैं, घुमक्कड़ बन गया हूँ मैं ||
आवारा हूँ मैं, बंजारा हूँ मैं |
ग़र हैं ललक समझने की, तो अब समझदार बन गया हूँ मैं ||
तुम भी समझो मुझे कभी, जानो और देखो...
भूल से परखो भी कभी... अब तो तपकर सोना बन गया हूँ मैं |
वक़्त को लिए हाथ मैं, घुमक्कड़ बन गया हूँ मैं ||
यहाँ हूँ मैं...करना मनन, समझकर सच्चाई को समझना |
मुसाफिर हूँ मैं तो बढता चला जाऊंगा...
मिले कभी मौका तो, चाहे कभी दिल तो, शब्दों में न उलझना ||
बस महसूस करना मुझे...अब इक फ़िज़ा बन गया हूँ मैं |
वक़्त को लिए हाथ मैं, घुमक्कड़ बन गया हूँ मैं ||
पाना मुझे जैसा हूँ मैं कि...कहीं और भटक जाते हैं लोग |
रेत को ठहरा हुआ पानी समझ लेते हैं लोग ||
मंजिल की दूरी देख, होता उसको अपने से दूर...
...रास्तों से ही लौट आते हैं लोग |
...फिर बहुत कुछ कोसते हैं लोग ||
कोशिश करना, साथ मेरे बने रहना..
ग़र झाकोगे तो दिखाऊंगा सच्चा अक्श भी...
...अब तो आइना बन गया हूँ मैं |
वक़्त को लिए हाथ मैं, घुमक्कड़ बन गया हूँ मैं ||
बक्शा हैं कुदरत ने, कुदरत का कैसा ये नायब नक्शा |
हमें भी तो दिया हैं इक दिल और उसकी अभिलाषा ||
मस्तिष्क में भर दिये अनंत दिशाओं के रास्ते...
पनपाओ उसमें आज तुम विवेक, और देखो क्या है उसकी इच्छा |
फिर रहा हूँ आज तक मैं उसी की उत्कंठा में,
ताकता रहूँ यहाँ है क्या ||
ताकता रहूँ यहाँ है क्या ||
ग़र है तुम्हे भी ललक तो बन जाओ,
वैसे... इक जिज्ञासु बन गया हूँ मैं |
वैसे... इक जिज्ञासु बन गया हूँ मैं |
वक़्त को लिए हाथ मैं, घुमक्कड़ बन गया हूँ मैं ||
वक़्त को लिए हाथ में, घुमक्कड़ बन गया हूँ मैं |
फिरता तो पहले भी था पर अब सम्हल गया हूँ मैं ||

1 टिप्पणी:
i have only word to say, that is..."Ultimate"
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