सोमवार, 17 जनवरी 2011

क्यूँ कलम...?


सर्वप्रथम आपको नमस्कार और हार्दिक स्वागत...यहाँ आप आखिर जिज्ञासा का दामन थामे हकीकत की इक सूरत पाने आ ही गये । अनुमान लगाने का शौक नही पर जानते हैँ जरुर नशा ही ऐसा है यह ।। जी हाँ, श्रीमान जी आप बेइंतहा उचित एवं सटीक फरमा रहे हैँ । ये तार मेरे दिल से जुडे व गुथे हैँ । जीया है मैँने हर इक ऐहसास को । इसी बीच बताना चाहूँगा कि मैँ क्या हूँ ...नही घोषित करता,  पर आपका विवेक और ऐहसास -ए-दिल जो कहने को मचल जाये, आपके शब्द हैँ... और जहाँ तक सच्चाई की बात है तो मै सच को हर आईने और मायने मेँ स्वीकार करने मेँ और सच को जीने मेँ विश्बास रखता हूँ। यद्यपि इन शब्दोँ की कुछ इमारतोँ ने उस वक्त सूरत-ए-हकीकत ले ली जब अनायास ही मेरे हाथ मेँ थमी कलम दिल के उठते सैलाब के ज़ज्बाती राह पर चलने को मजबूर हो गई।
तस्वीर साफ है...
'' अब ये मीठा सा दर्द हर पल इक सजदा सा लगता है ॥ ''
 

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